Indian Gangaur Festival भारतीय गणगौर त्यौहार

Indian Gangaur Festival भारतीय गणगौर त्यौहार

            Indian Gangaur Festival भारतीय गणगौर त्यौहार एक ऐसा पर्व है जिसे, हर स्त्री के द्वारा मनाया जाता है इसमें कुवारी कन्या से लेकर, विवाहित स्त्री दोनों ही, पूरी विधी-विधान से गणगौर जिसमे, भगवान शिव व माता पार्वती का पूजन करती है इस पूजन का महत्व कुवारी कन्या के लिये, अच्छे वर की कामना को लेकर रहता है जबकि, विवाहित स्त्री अपने पति की दीर्घायु के लिये होता है जिसमे कुवारी कन्या पूरी तरह से तैयार होकर और, विवाहित स्त्री सोलह श्रंगार करके विधी-विधान से पूजन करती है

Indian Gangaur Festival

Indian Gangaur Festival भारतीय गणगौर त्यौहार

नाम

गणगौर त्यौहार

कब मनाया जाता है

चैत्र नवरात्र की तृतीय तिथि पर

किसकी पूजा की जाती है

भगवान शिव एवं माता पार्वती की

     लग्न -मंड़प में पंड़ित जी नव वर-वधू को शिव-पार्वती की कथा सुनाते हैं। इसका अर्थ यह हैं कि महिलाएँ दाम्पत्य से जुड़े जितने पर्व-त्यौहार मनाती हैं, वे सब सुहाग की देवी माँ पार्वती से जुडे़ हैं। महिलाओं का सबसे मधुर पर्व गणगौर हैं और राजस्थानी नारियों का सबसे बङ़ा पर्व हैं गणगौर राजाओं के समय वर्तमान राजधानी जयपुर में राजमहल से सजी धजी गणगौर की सवारी निकलती थी।

      गणगौंर के दिनों में जयपुर की नारियाँ अपने रूप, यौवन, सुंदरता का गणगौर जैसा ही श्रृंगार करने के लिये जिस बाजार से सौन्दर्य प्रसाधन खरीदती थी, वह बाजार आज भी गणगौरी बाजार कहलाता है। बूंदी में कई दिनों तक चलने वाला गणगौर मेला सारे राजस्थान और पूरे उत्तर भारत में प्रसिद्ध है। गणगौर पर उदयपुर के मोती चोहट्टा में भरने वाला मेला भी बहुत आकर्षक व हर्षोल्लास भरा है।
     मगर राजस्थान में गणगौर के लगने वाले मेलों और मनायें जाने वाले पर्व में सबसे ज्यादा खास है राजसमंद की गणगौर। आज की तारीख में राजसमंद की गणगौर का पूरे राजस्थान में कोई मुकाबला नहीं है।  

Indian Gangaur Festival
 

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1. Ramjan / Ramdan / रमजान / रमदान

There is a historical reason for Gangaur festival.

गणगौर त्यौहार का ऐतिहासिक कारण हैं 

मेवाङ में महाराणा राजसिंह के शासन-काल में जब वृंदावन से श्रीनाथजी मेवाड़ पधारे तब महाराणा ने उन्हें सिंहाड़- नाथद्वारा में पधराया। श्रीनाथजी के पीछे-पीछे जब मथुरा से द्वारिकाधीश पधारे तो महाराणा राजसिंह ने उन्हें अपने द्वारा बनवायी गयी राजसंमद झील के किनारे पधराया और राजसमंद नगर बसना आरम्भ हों गया। तब मेवाङ में श्रीनाथजी व द्वारिकाधीश के साथ बृज-संस्कृति का प्रवेश हुआ और नाथद्वारा व राजसंमद बृज-संस्कृति के नये केन्द्र की तरह विकसित होने लगे। राधारानी कें मुकाबले धरती तो क्या पूरी सृष्टि में कोई सुंदरी नहीं है। राधा जैसा श्रृंगार धरती की सुंदरियाँ तो क्या स्वर्ग की अप्सराएँ औंर देवलोक की देवियाँ भी नही कर पाती है। राधा जैसी अल्हड़ता किसी स्त्री, अप्सरा और देवी में नही है। राधा जैसा पवित्र और खुला प्रेम संसार की कोई स्त्री आज तक नहीं कर पायी। कृष्ण जैसे ईश्वर से भी सवाई सिद्ध होने वाली राधा जैंसी प्रेमिका फिर धरती पर नहीं जन्मी।     

    गणगौर पर्व नवविवाहितों के दाम्पत्य जीवन में प्रवेश का प्रथम द्वार माना जाता है। बुद्धिमान और चतुर पुरूष तो अपनी पत्नी को पहली रात्रि से ही समझना आरम्भ कर देता है। किंतु औसत पुरुष शादी के वर्षो बाद भी अपनी पत्नी को अच्छी तरह नहीं समझ पाता। अतः गणगौर पर्व हर औंसत पुरुष को वर्ष में कुछ दिन यह अवसर देता हैं कि वह धीरे-धीरे अपनी पत्नी को अच्छी तरह समझ सके।
    इस तरह गणगौंर पर्व वस्तुतः नारी के आंतरिक व्यक्तिव को मुख्य रूप में प्रकट करता हैं। गणगौर के माध्यम से स्त्री अपने पति को समझाती है कि वह भीतर से कितनी सुंदर है? उसके मन में सुख की कैसी-कैसी इच्छाएँ- आकांक्षाएँ और प्रेम की कितनी भावनाएँ भरी हुई है?
    गणगौर पर्व के दिनों में पत्नी अपने पति की प्रेमिका जैसी हो जाती है। वह प्रेमिका जैंसा ही नित्य नया श्रृंगार कर अपने पति को प्रेमी जैंसा ही लुभाती व रिझाती है।
     जयपुर में बड़ी गणगौर के दिन राजमहल से गणगौर की सवारी निकलती। जिसमें गणगौर का राजसी ठाट-बाट से श्रृंगार होता। सभी सरदार रजवाड़ी पोशाक में और राजपूत महिलाएँ राजस्थानी वेश-भूषा में, मेघा ड़म्बर, छड़ियाँ-चँदोवा सहित पूरा शाही लवाजमा गणगौर की सवारी के साथ होता।
     बूंदी में गणगौर पर्व ने मेले का रूप धारण कर रखा हैं। यहां छतरियों में गणगौरों को सज्जाधजा कर रखा जाता हैं। स्नान-श्रृंगार किये किशोरियाँ, युवतियाँ व महिलाएँ खूब आमोद-प्रमोद करती हैं और युवक-पुरुष इस महिला-समूह की चंचल क्रीड़ाओं का मंत्र-मुग्ध रूप से आनंद लेते हैं।

FAQ

Q : गणगौर त्यौहार का क्या महत्व है?
Ans : गणगौर त्यौहार के दिन भगवान शिव एवं पार्वती की पूजा की जाती हैं। यह पूजा कुंवारी व विवाहित दोनों ही स्त्रियाँ करती हैं। कुंवारी लड़कियाँ अच्छे वर की कामना से व विवाहित स्त्रियाँ अपने पति की लंबी उम्र के लिए यह व्रत करती हैं।

Q : गणगौर त्यौहार कैसे मनाया जाता है ?
Ans : गणगौर के दिन सभी स्त्रियाँ सोलह सिंगार करके भगवान शिव एवं माता पार्वती की पूजा करती हैं  और यह व्रत करती हैं

Q : गणगौर त्यौहार का व्रत क्यों किया जाता है ?
Ans : गणगौर त्यौहार का व्रत भगवान शिव एवं माता पार्वती का पर्व होता हैं यह इसलिए किया जाता हैं ताकि भगवान शिव कुंवारी लड़कियाँ को अच्छा वर प्रदान करें एवं विवाहित स्त्रियाँ के पति की लंबी उम्र हो सके

Q : गणगौर की पूजा में क्या क्या सामग्री चाहिए ?
Ans : गणगौर की पूजा में पटा, कलश, मिट्टी के गमले, काली मिट्टी, दीपक, रोरी, चावल, घी, हल्दी, फूल, आम के पत्ते, दूबा, पान के पत्ते, नारियल, सुपाड़ी, वस्त्र, गेहूं बांस की टोकनी एवं चुनरी आदि सामग्री की आवश्यकता होती हैं


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